Posted by: bharatiyam on: सितम्बर 19, 2008
फिर भी तमाम दंगे फसाद और हिंसा धर्म के नाम पर ही की जा रही है. भारत में आए दिन आतंकी घटनाओं को अंजाम देने वाले आतंकवादी इसे जिहाद का नाम देते हैं. धर्म को यूं बदनाम करने का क्या कारण है … किस धर्म ने कहा है कि इंसान और इंसान के बीच फर्क है और यह कि अपने मजहब की खातिर दूसरे धर्म के अनुयायी को जान से मार देना चाहिए?
वे लोग जिन्हें कौम या मुल्क से कोई शिकायत है, वे जिन्हें यह लगता है कि उनके साथ (तथाकथित) अन्याय हुआ…. उनकी उपेक्षा की गई या अधिकार से वंचित किया गया… वे अपने अधिकारों के लिए लड़ें, झगड़ें लेकिन इतना जरूर समझ लें कि निर्दोष लोगों की हत्या करने से उनका मंसूबा कभी पूरा नहीं होगा. इस लड़ाई का अंत एक दिन पुलिस की गोली से होता है या फांसी के तख्ते पर.
हिंसा ने कभी मसलों को हल नहीं किया. जो यह सोचता है कि धर्म की आड़ में ऐसा करना जायज है तो वह गलत है. किसी भी धर्म और मजहब में हिंसा की अनुमति नहीं है. सो मजहब की आड़ लेकर तशद्दुत में मुब्तला लोगों को अपने गिरहबान में झांक कर देख लेना होगा कि क्या मजहब के नाम पर जो वो कर रहे हैं वह सही है? ऐसे लोगों को समझना होगा कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना…. इसलिए मजहब के नाम पर हिंसा छोड़कर अमन से रहें.
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